Thursday, July 2, 2009

एक गिलास ठंडक


गर्मीयों के इस गर्म मौसम मे भी तुर्कमान गेट अपनी ठड़क को लोगो तक फैलाने से जाना जाता है । भीड़ वाली गर्माहट के साथ यह अपने में (उसकी गर्मी को कम करने के )अनेक तरीको को साथ लिए जगह-जगह बैठा रहता है। कई जगह लोग छोटे से तख़्त पर अपनी उस घरेलू दुकान को खोले एक गिलाश ठड़क को कुछ पैसो के बदले बाटते आ रहे है।इस दुकान की सज़ावट एक बड़े पतीले से शुरु होकर कॉच के गिलाश पर खत्म होती है। दुकान लगाने की विधी भी काफि आसान और सस्ती है। इस दुकान को लगाने के लिए चहिए होगा, एक तख़्त जिस पर लाल रंग की तिरपाल पर एक बड़ा सा पतीला जिसमे लाल रंग के शरबत में चीनी की काफि मात्रा के साथ बर्फ की भरमार होती है। कुछ गिलाश जिसमे दो ओर तीन रुपय के साथ शरबत की मात्रा को भी मापा जाए। एक पौना शरबत को गिलाश में डालने के लिए। एक रुहाबज़ा की बोतल जो पिलाने के लिए कम और दिखाने के लिए ज्यादा होती हैं।

गर्मीयो के शुरू होते ही यह अपनी तैयारीयों के साथ अपने पुराने ठियो पर जाते है। अपने हुनर को इस तरहा दिखाते है कि उसकी मिठास से लोग अपने नेटवर्को को फैलाना सीख लेते है। बाज़ार में चलते लोग उस लाल शरबत की ठड़क और उसकी मिठास को चखने के लिए उस नुक्कड़ पर रूक ही जाते है। जहां यह दुकान अपना मुकाम जमाए है। यह दुकान हज़ मंज़िल के ठीक सामने तुर्कमान के प्राचीन गेट से सटकर उसके पीछे बनी है। जिस पर बैठा मास्टर जी नाम का एक अधेड़ उम्र का व्याक्ति अपने हाथ के कमाल को मिठास में भीगो-भीगो कर लोगो तक पहुचाता है मास्टर जी अब सिर्फ ग्रहको से पैसे लेने के लिए ही बैठा करते है। क्योकि उन्हौने अपनी उस छोटी सी दुकान पर छोटू यानी लड़को को लगा लिया है। छोटू इस लिए की उनका कोइ नाम नही जनता जो भी उन्हे बोलता छोटू ही बोलता यह सुबहा से अपनी दुकान लगाते है। और पतीला खाली होने यानी छह बज़े तक बन्द कर देते है। इनका यह कार्यक्रम गर्मी मे ठड़क का है और ठड़क होते ही यह अपनी दुकान बंद कर चल देते है अपने आकर्षण की ओर...

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