
अजमेरी गेट जिसका अक्सर नाम सुनने के बाद मन मे एक छवि उभर आती थी। पुराने जमाने का एक बड़ा सा दरवाज़ा जिसके रंग को समय अपने नीचे दबाकर मटमेला कर रहा होगा। बड़ी बड़ी ईट की चौखट जिसकी लाली बदलाब के साथ अपने आप को रंगो मे बदल रही होगी। पुराने जमाने की नंकाशी जो लोगो के हाथ की छुअन से अपना रुप बदल चुकी होगी। उपर की तरफ एक नैम प्लेट जिसके कुछ शब्द टुट चुके होंगे।मगर कुछ शब्दो के टुटने के बाद भी उनकी छोड़ी गई छाप आप से कह रही होगी
"अजमेरी गेट मे आपका स्वागत् है"
अजमेरी गेट जहां की कल्पनिक दुनिया से तो मैंं आप को वाकिफ करा ही चुका हूँ। मगर जो मार्किट उस जगहा में अपना अस्तित्व बनाए वहां रोज़र्मरा मे लोगो को जोड़ती हैं। उस के बारे में हम नही जानते ओर न ही बोलते। क्योंकि यह जगहा अपने में होकर केई चीज़ो को उभारती हे।यह जगहा अपने अन्दर एक बड़े बज़ार को रख कर खो जाने की एक अलग उम्मीद को लेकर जी रही हैं।
अजमेरी गेट एक मोटर मार्केट के साथ केई लोगो के रोज़गारो से जुड़े छोटे बड़े कामो में जुड़ता व जुड़ाता हे। चाहे वो एक गाड़ी वाला हो या दुकान के एक कोने में अपनी पेटी सजाए एक मोची । अजमेरी गेट पर दुकानो की एक लम्बी लाइन जो अपने को दिखाने की कोशीश मे रोज़मर्रा मे जुड़े लोगो को अपनी ओर अमत्रित करती है।
ऐसे बज़ारो में लोगो कि नज़रे कभी हमे बुलाती तो कभी कटने का अहसास भी दिलाती हैं। अजमेरी गेट के रास्ते मे जो गलीया हे उनके नाम ओर उनकी काया को बाहर से समझना ना मुमकिन हैं। क्योकि कुछ गलीया अपने नाम के साथ एक वज़न लिए वहाँ अपना रुआब जमाऐ खड़ी हे। जैसे दो गलीया है एक "बंदुक वाली गली" दुसरी "बल्ले वाली गली" एसी गलीयो के नाम से ही एहसास होता हैं। कि अन्दर क्या होता होगा ?या क्या होता है?
No comments:
Post a Comment